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" रीना-शैला लोकगीत एवं नृत्य "

(छत्तीसगढ़ राज्य की बैगा विशेष पिछड़ी जनजाति में प्रचलित रीना-शैला लोकगीत एवं नृत्य)

रीना - यह गायन की पद्धति है, जिसे बैगा जनजाति की माताएं अथवा वृद्ध महिलाएं अपने प्रेम एवं वात्सल्य से देवी-देवताओं और अपनी संस्कृति का गुणगान गायन के माध्यम से उनमें गीत एवं नृत्य से बच्चों को परिचित कराने का प्रयास करती है। साथ ही बैगा माताएं अपने छोटे शिशु को सीखाने एवं वात्सल्य के रूप में भी रीना का गायन करती है |

शैला - बैगा जनजाति के पुरूषों के द्वारा शैला नृत्य शैला ईष्ट देव एवं पूर्वज देव जैसे - करमद देव, ग्राम देव, ठाकुर देव, धरती माता, तथा कुल देव,- नांगा बैगा, बैगीन को सुमिरन कर अपने फसलों के पक जाने पर धन्यवाद स्वरूप अपने परिवार के सुख समृद्धि तथा पारिवारिक सुख-दूख की स्थिति का एक दूसर को शैला गीत एवं नृत्य के माध्यम से बताने का प्रयास किया जाता है।

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छत्तीसगढ़ राज्य की बैगा विशेष पिछड़ी जनजाति में प्रचलित रीना-शैला लोकगीत एवं नृत्य :-

  • सामान्य परिचय - बैगा जनजाति छ.ग. राज्य की 05 विशेष पिछड़ी जनजातियों में से एक है। बैगा जनजाति राज्य को कबीरधाम, मुंगेली, राजनांदगांव , बिलासपुर एवं कोरिया जिले में निवासरत हैं। बैगा जनजाति का प्रकृति एवं वनो से निकट सम्बन्ध है। जिनका बखान इनके लोक संस्कृति में व्यापक रूप से देखने को मिलता है। बैगा जनजाति अपने ईष्ट देव की स्तुति, तीज-त्यौहार, उत्सव एवं मनोरंजन की दृष्टि से विभिन्न लोकगीत एवं नृत्य का गायन समुह में करते है| इनके लोकगीत एवं नृत्य में करमा, रीना-शैला, ददरिया, बिहाव, फाग आदि प्रमुख है।
    रीना-शैला का संक्षिप्त विवरण निम्नांकित है -
  • रीना - यह गायन की पद्धति है, जिसे बैगा जनजाति की माताएं अथवा वृद्ध महिलाएं अपने प्रेम एवं वात्सल्य से देवी-देवताओं और अपनी संस्कृति का गुणगान गायन के माध्यम से उनमें गीत एवं नृत्य से बच्चों को परिचित कराने का प्रयास करती है। साथ ही बैगा माताएं अपने छोटे शिशु को सीखाने एवं वात्सल्य के रूप में भी रीना का गायन करती है |
    वेशभूषा - महिला सफेद रंग की साड़ी धारण करती है। गले में सुता-माला, कान में ढार, बांह में नागमोरी, हाथ में चूड़ी, पैर में कांसे का चूड़ा एवं ककनी, बनुरिया से श्रृंगार करती है।
    वाद्ययंत्र - ढोल, टीमकी, बांसुरी, ठीसकी, पैजना
  • शैला - बैगा जनजाति के पुरूषों के द्वारा शैला नृत्य शैला ईष्ट देव एवं पूर्वज देव जैसे - करमद देव, ग्राम देव, ठाकुर देव, धरती माता, तथा कुल देव,- नांगा बैगा, बैगीन को सुमिरन कर अपने फसलों के पक जाने पर धन्यवाद स्वरूप अपने परिवार के सुख समृद्धि तथा पारिवारिक सुख-दूख की स्थिति का एक दूसर को शैला गीत एवं नृत्य के माध्यम से बताने का प्रयास किया जाता है।
    वेशभूषा - धोती, कुरता, जाॅकेट, पगडी, पैर में पैजना, सूता माला
    वाद्ययंत्र -मांदर, ढोल, टीमकी, बांसुरी, ठीसकी, पैजना
    बोली - बैगा जनजाति द्वारा रीना एवं शैला का गायन स्वयं की बैगानी बोली में किया जाता है।
    अवसर - बैगा जनजाति द्वारा क्वार से कार्तिक माह (सितम्बर से नवम्बर माह) के बीच किया जाता है।
    सदस्य - समूह में गायन एवं नृत्य किया जाता है।

" दशहेरा करमा लोकगीत एवं नृत्य "

(छत्तीसगढ़ राज्य की बैगा विशेष पिछड़ी जनजाति में प्रचलित दशहेरा करमा लोकगीत एवं नृत्य)

दशहेरा करमा - बैगा जनजाति समुदाय द्वारा करमा नृत्य भादो पुन्नी से माघी पुन्नी (अगस्त से जनवरी माह) के समय किया जाता है। इस समय बैगा जनजाति के पुरूष सदस्य अन्य ग्रामों में जाते है जहां इनके द्वारा करमा नृत्य हेतु उक्त ग्राम के सदस्यों को आवाहन किया जाता है जिसके प्रतिउत्तर में उस ग्राम की महिलाएं श्रृगार कर आती है। तत्पश्चात प्रश्नोत्तरी के रूप में करमा गायन व नृत्य किया जाता है। इसी प्रकार अन्य ग्राम से आमंत्रण आने पर भी बैगा स्त्री-पुरूष के दल द्वारा करमा किया जाता है। करमा, रात्रि के समय ग्राम में एक निर्धारित खुला स्थान जिसे खरना कहा जाता है में अलाव जलाकर सभी आयु के स्त्री, पुरूष एवं बच्चे नृत्य करते हुए अपने सुख-दुख को एक दुसरे को प्रश्न एवं उत्तर के रूप में गीत एवं नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत करते है। करमा नृत्य के माध्यम से बैगा जनजाति में परस्पर सामान्जस्य, सुख-दुख के लेन देन के साथ ही नव युवक-युवतियां भी आपस में परिचय प्राप्त करते हैं।

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छत्तीसगढ़ राज्य की बैगा विशेष पिछड़ी जनजाति में प्रचलित दशहेरा करमा लोकगीत एवं नृत्य :-

  • सामान्य परिचय - बैगा जनजाति छ.ग. राज्य की 05 विशेष पिछड़ी जनजातियों में से एक है। बैगा जनजाति राज्य को कबीरधाम, मुंगेली, राजनांदगांव , बिलासपुर एवं कोरिया जिले में निवासरत हैं। बैगा जनजाति का प्रकृति एवं वनो से निकट सम्बन्ध है। जिनका बखान इनके लोक संस्कृति में व्यापक रूप से देखने को मिलता है। बैगा जनजाति अपने ईष्ट देव की स्तुति, तीज-त्यौहार, उत्सव एवं मनोरंजन की दृष्टि से विभिन्न लोकगीत एवं नृत्य का गायन समुह में करते है| इनके लोकगीत एवं नृत्य में करमा, रीना-शैला, ददरिया, बिहाव, फाग आदि प्रमुख है।
    दशहेरा करमा का संक्षिप्त विवरण निम्नांकित है -
  • दशहेरा करमा - बैगा जनजाति समुदाय द्वारा करमा नृत्य भादो पुन्नी से माघी पुन्नी (अगस्त से जनवरी माह) के समय किया जाता है। इस समय बैगा जनजाति के पुरूष सदस्य अन्य ग्रामों में जाते है जहां इनके द्वारा करमा नृत्य हेतु उक्त ग्राम के सदस्यों को आवाहन किया जाता है जिसके प्रतिउत्तर में उस ग्राम की महिलाएं श्रृगार कर आती है। तत्पश्चात प्रश्नोत्तरी के रूप में करमा गायन व नृत्य किया जाता है। इसी प्रकार अन्य ग्राम से आमंत्रण आने पर भी बैगा स्त्री-पुरूष के दल द्वारा करमा किया जाता है। करमा, रात्रि के समय ग्राम में एक निर्धारित खुला स्थान जिसे खरना कहा जाता है में अलाव जलाकर सभी आयु के स्त्री, पुरूष एवं बच्चे नृत्य करते हुए अपने सुख-दुख को एक दुसरे को प्रश्न एवं उत्तर के रूप में गीत एवं नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत करते है।
    करमा नृत्य के माध्यम से बैगा जनजाति में परस्पर सामान्जस्य, सुख-दुख के लेन देन के साथ ही नव युवक-युवतियां भी आपस में परिचय प्राप्त करते हैं।
    श्रृंगार -
    महिला - दशहेरा करमा नृत्य हेतु महिलाओं द्वारा विशेष श्रृंगार किया जाता है, जिसमें ये चरखाना (खादी) का प्रायः लाल एवं सफेद रंग का लुगड़ा, लाल रंग की ब्लाउज, सिर पर मोर पंख की कलगी, कानों में ढार, गले में सुता-माला, बांह में नागमोरी, कलाई में रंगीन चूड़िया, एवं पैरों में पाजनी एवं विशेष रूप से सिर के बाल से कमर के नीचे तक बीरन घास की बनी लड़ियां धारण करती हैं जिससे इनका सौंदर्य एवं श्रृंगार देखते ही बनता है।
    पुरूष - पुरूष वर्ग भी श्रृंगार के रूप में सफेद रंग की धोती, कुरता, काले रंग की कोट/जाकेट, सिर पर मोर पंख लगी पगड़ी तथा गले में आवश्यकतानुसार माला धारण करते है।
    वाद्ययंत्र - मांदर, टिमकी, ढोल, बांसुरी, ठिचकी, पैजना
    सदस्य - बैगा जनजाति सदस्यों द्वारा दशहेरा करमा नृत्य 15-20 महिला एवं 15-20 पुरूष सदस्यों के समूह में किया जाता है।