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छत्तीसगढ़ के बारे में

छत्तीसगढ़ के बारे में

छत्तीसगढ़ मध्य भारत में स्थित है। राज्य पश्चिम में मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र, उत्तर में उत्तर प्रदेश, पूर्व में ओडिशा और झारखंड और दक्षिण में आंध्र प्रदेश के साथ अपनी सीमा साझा करता है।

छत्तीसगढ़ राज्य 1 नवंबर 2000 को अस्तित्व में आया। 10 फरवरी 2020 को गोरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के अस्तित्व में आने के बाद, छत्तीसगढ़ में जिलों की संख्या बढ़कर 28 हो गई है।

छत्तीसगढ़ राज्य के शेष 27 जिले इस प्रकार हैं: -

सरगुजा संभाग: कोरिया, बलरामपुर, सूरजपुर, जशपुर, सरगुजा
बिलासपुर संभाग: बिलासपुर, मुंगेली, कोरबा, जांजगीर-चांपा, रायगढ़
दुर्ग संभाग: कबीरधाम, बेमेतरा, दुर्ग, बालोद, राजनांदगांव
रायपुर संभाग: रायपुर, धमतरी, बलौदाबाजार, गरियाबंद, महासमुंद
बस्तर संभाग: कांकेर, नारायणपुर, कोंडागांव, बस्तर, दंतेवाड़ा, बीजापुर, सुकमा


छत्तीसगढ़ में जनजातियाँ

जिलेवार जनजातियाँ

जिले

जनजातियाँ

बस्तर गौंड
हल्बा
धुरवा
नारायणपुर, बस्तर अबुझमाड़िया
बाइसन हार्न माड़िया
मुरिया
रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़, दुर्ग, सरगुजा कवर
रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़, सरगुजा बिंझवार

जनजातीय जनसंख्या

जनगणना 2011 के अनुसार छत्तीसगढ़ की कुल जनसंख्या: 2,55,45,198


जनगणना 2011 के अनुसार छत्तीसगढ़ की जनजातीय जनसंख्या :

जनजाति

जनसंख्या

प्रतिशत %

अनुसूचित जनजाति 78,22,902 30.60
अनुसूचित जाति 32,74,269 12.82
अन्य पिछड़ा वर्ग - 52

जनजातीय साक्षरता


जनगणना 2011 के अनुसार छत्तीसगढ़ के अनुसूचित जनजातियों में कुल साक्षरता प्रतिशत : 59.1 %


पुरूषों की साक्षरता प्रतिशत : 69.7 %


स्त्रियों की साक्षरता प्रतिशत : 48.8 %

जनजातीय लिंगानुपात


छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जनजाति आबादी का लिंग अनुपात प्रति 1000 पुरुषों पर 1013 महिलाएं है|


यह कुल अनुसूचित जनजाति आबादी के राष्ट्रीय औसत 978 से बेहतर है|


0-6 वर्ष आयु वर्ग में अनुसूचित जनजाति के बीच लिंगानुपात 998 राष्ट्रीय औसत से अधिक है।

छत्तीसगढ़ की अनुसूचित जनजातियों की वर्गीकृत विशेषताएँ संक्षिप्त में निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर दिया जा रहा है:-


1. भौगोलिक क्षेत्र के आधार पर

छत्तीसगढ़ के जनजातियों को भौगोलिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से 3 भागों में विभाजित किया जा सकता है:-

  • उत्तर सांस्कृतिक क्षेत्र (सरगुजा संभाग) :- इस क्षेत्र में सरगुजा, सूरजपुर, बलरामपुर, कोरिया, जशपुर जिले तथा रायगढ़, कोरबा जिले के पहाड़ी क्षेत्रों की जनजातियांे को सम्मिलित किया जा सकता है। यह क्षेत्र घने जंगलों व पहाड़ियों से आच्छादित है। इस क्षेत्र में मुख्यतः उरांव, कंवर, मुण्डा, नगेसिया, कोरवा, भूइंहर, भूमिया, धनवार, सौंता, बियार, मझवार, माझी, खरिया, सवरा, बिरहोर, कोंध, खैरवार, गोंड, बैगा, अगरिया आदि जनजातियाँ निवास करती हैं।
  • मध्य सांस्कृतिक क्षेत्र (बिलासपुर, रायपुर, दुर्ग संभाग) :- इस क्षेत्र में बिलासपुर, जांजगीर-चांपा, मुंगेली, रायगढ़ एवं कोरबा जिल के मैदानी क्षेत्र, महासमुंद, रायपुर, गरियाबंद, धमतरी, दुर्ग, बालोद, राजनांदगांव, कवर्धा (कबीरधाम) आदि जिले के जनजातियों को सम्मिलित किया जा सकता है। इस क्षेत्र में समतल मैदानी क्षेत्र, जंगल व पहाड़ियों युक्त भाग आते हैं। इस क्षेत्र में गोंड़, हलबा, कमार, भुंजिया, अगरिया, बैगा, कोंध, सवरा, कंवर, शिकारी पारधी, बिंझवार, धनवार, सौंता, भैना, परधान आदि जनजातियाँ निवास करते हैं।
  • दक्षिणी सांस्कृतिक क्षेत्र (बस्तर संभाग) :- इस क्षेत्र में दंतेवाड़ा, बीजापुर, सुकमा, कोंडागांव, बस्तर, नारायणपुर और कंाकेर जिले के जनजातियों को सम्मिलित किया जा सकता है। यह क्षेत्र घने वनों व पहाड़ियों से आच्छादित है। इस क्षेत्र में हलबा, अबुझमाड़िया, गदबा, परजा, दोरला, भतरा, मुरिया, माडिया, गांेड आदि जनजातियाँ निवास करती हैं।

2. आर्थिक जीवन के आधार पर

छत्तीसगढ़ की जनजातियों को उनके आर्थिक जीवन के आधार पर निम्नलिखित प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है:-

  • खाद्य संग्रहक व शिकारी जनजातियाँ:- इस समूह की जनजातियाँ मुख्यतः कंदमूल, फल, जंगली भाजी संग्रह करते तथा खरगोश, हिरण, गोह, लोमड़ी आदि का शिकार कर खाते हैं। इस वर्ग में बिरहोर तथा पहाड़ी कोरवा आते हैं।
  • आदिम कृषक, शिकारी, खाद्य संकलक जनजातियाँ:- इस समूह की जनजातियाँ कंदमूल, फल संग्रह, शिकार, मछली पकड़ने के अतिरिक्त जंगल के पेड़ों को काटकर व जलाकर उस पर आदिम कृषि भी करते हैं। इस समूह में बैगा, अबुझमाड़िया, कमार, माझी, पण्डो आदि जनजातियाँ आती हैं। बैगा व पण्डो जनजाति ‘‘बेवरा‘‘ और कमार तथा अबुझमाड़िया ‘‘पेंदा‘‘ कहते हैं।
  • कृषक जनजातियाँ :- इस समूह की जनजातियाँ जंगली उपज संग्रह व शिकार के साथ स्थायी कृषि करते हैं। इस वर्ग में बिंझवार, सवरा, गोंड, मुरिया, हलबा, भतरा, भुंजिया, भूमिया, बियार, कंवर, मझवार, मुण्डा, भैना, नगेसिया आदि आते हैं।
  • उन्नत कृषि जनजातियाँ :- इस वर्ग में वे जनजातियाँ है जो पूर्व में जागीरदार, मालगुजार आदि थे। इस समूह की जनजातियों में तंवर, राजगोंड, बिलासपुर, रायपुर, धमतरी, गरियाबंद, महासमुंद, दुर्ग, बालोद, बेमेतरा, कवर्धा, जांजगीर-चांपा आदि जिले के समतल मैदानी क्षेत्रों के ग्रामों में अन्य जातियों के साथ निवासरत गोंड जनजाति आते हैं।
  • शिल्पकार जनजातियाँ :- इस वर्ग की जनजातियाँ जंगली उपज संग्रह, शिकार, आदिम कृषि के साथ-साथ बांस से टोकरी, ‘‘झऊंहा‘‘, ‘‘सूपा‘‘ बनाते हैं। इस समूह में कमार, कंडरा, धनवार, सौंता, बैगा, माझी, दोरला आदि जनजाति आते हैं। शिकारी पारधी जनजााति के लोग छींद के पत्तों से झाडू, चटाई, टोकरी आदि बनाते हैं। बिरहोर एवं खोण्ड जनजाति मोहलाइन छाल से व उरई से रस्सी बनाते हैं। अगरिया लौह पत्थर (अयस्क) को गलाकर प्राप्त लोहा से कृषि उपकरण बनाते हैं।
  • कला - कौशल व अन्य कार्यों में संलग्न जनजातियाँ :- गोंड की उपजाति परधान, किन्नरी बजाकर, लोकगीत गाकर तथा ओझा गोंड डहकी बजाकर महादेव जी का लोकगीत गाकर अन्य गोंड जनजाति के घर भिक्षा मांगते हैं। ओझा गोंड महिलाएँ गोदना गोदने का कार्य करती हैं। खैरवार जनजाति के लोग खैरवृक्ष से कत्था बनाते हैं।

3. सामाजिक तथा आर्थिक विकास के आधार पर

विकास के आधार पर छत्तीसगढ़ की जनजातियों को निम्नलिखित चार वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है:-

  • अविकसित जनजातियाँ : इस समूह में आने वाली जनजातियाँ अभी सामाजिक, आर्थिक विकास की दृष्टि से काफी पीछे है। इस वर्ग में कमार, अबुझमाड़िया, पहाड़ी कोरवा, बैगा, बिरहोर, पाण्डो आदि जनजातियाँ आती हैं।
  • अल्प विकसित जनजातियाँ : इस समूह की जनजातियाँ सामाजिक, आर्थिक विकास की ओर अग्रसर हैं, किन्तु इनका विकास अभी अल्प विकसित स्थिति तक हो पाई है। इस वर्ग में मुरिया, माडिया, अगरिया, भतरा, भूमिया, धनवार, खरिया, माझी, मझवार, नगेसिया, पारधी शिकारी, परजा, भुंजिया, सौंता आदि आते हैं।
  • विकासशील (विकास के समीप अग्रसर) जनजातियाँ : इस समूह में आने वाली जनजातियाँ विकसित होकर शासकीय सुविधाओं का समुचित उपयोग कर रही हैं। इनका सामाजिक, आर्थिक व शैक्षणिक स्थिति अन्य पिछड़ा वर्ग के कई जातियों के समकक्ष पहुंच चुकी हैं। इस वर्ग में कंवर, भैना, गोंड, परधान, सवरा, गदबा, कोंध, मुण्डा आदि आते हैं।
  • विकसित जनजातियाँ : इस समूह में आने वाली जनजातियाँ शासकीय, आर्थिक विकास कार्यक्रम, शिक्षण, बाह्य संपर्क आदि का लाभ लेकर उपरोक्त अन्य जनजातियों की अपेक्षा विकसित हो चुकी है। शासकीय सेवाओं में जनजातियों के लिए आरक्षित पदों पर इस समूह के अधिकांश लोग कार्य कर रहे हैं। इस वर्ग में राजगोंड, तंवर, हलबा, उरांव आदि आते हैं।

4. भाषा (बोली) वैज्ञानिक आधार पर

छत्तीसगढ़ के अनुसूचित जनजातियों को भाषाई आधार पर मुख्यतः तीन भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है:-

  • आर्य भाषा परिवार की बोली : इस समूह में वे जनजातियाँ आती है जो अपनी परंपरागत मूल बोली को भूलकर स्थानीय क्षेत्रीय बोली या क्षेत्रीय व मूल बोली का मिश्रित रूप बोलती हैं। इस वर्ग में छत्तीसगढ़ी बोलने वाली जनजाति कंवर, बिंझवार, भुंजिया, धनवार, भैना, बैगा, हलबा आदि।
  • आस्ट्रीक भाषा परिवार की बोली : इस समूह में कोलारियन व मुण्डारी भाषा समूह की बोली बोलने वाली जनजातियाँ आती हैं। जैसे - मुण्डा (मुण्डारी बोली), कोरवा (कोरवा बोली), माझी (माझी बोली), खरिया (खरिया बोली), गदबा (गदबा बोली), बिरहोर व सवरा आदि।  
  • द्रविड़ भाषा परिवार की बोली : कुछ जनजाति वर्ग इस भाषा समूह की बोली बोलते हैं। जैसे - गोंड (गोंडी या कोया), उरांव (कुड़ुख बोली), कोंध (कुई बोली), दोरला (दोरली बोली), परजा (परजी बोली) आदि।

5. प्रजातीय लक्षणों के आधार पर

  • छत्तीसगढ़ की समस्त अनुसूचित जनजातियों में प्रोटो-आस्ट्रोलायड प्रजातीय लक्षण पाये जाते हैं। यह लक्षण मुण्डा, उरांव, बैगा, गोंड आदि जनजातियों में अधिक स्पष्ट परिलक्षित होती है।

6. जनसंख्या के आधार पर

जनगणना 2011 की जनसंख्या के आधार पर छत्तीसगढ़ के जनजातियों को निम्नलिखित समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है :-

क्र.

जनजाति का नाम

जनसंख्या

25 लाख से अधिक
1. गोंड एवं उपजातियाँ 42,98,404
10 लाख से 25 लाख तक
कोई जनजाति नहीं
5 लाख से 10 लाख तक़
1. कंवर 8,87,477
2. उरांव 7,48,789
1 लाख से 5 लाख तक
1. हलबा 3,75,182
2. भतरा 2,13,900
3. सवरा 1,30,709
4. कोरवा 1,29,429
5. बिंझवार 1,19,718
6. नगेसिया 1,14,532
7. भूमिया, भूइंहर, भूमिया 1,13,967

क्र.

जनजाति का नाम

जनसंख्या

50 हजार से 1 लाख तक
1. बैगा 89,744
2. खैरवार 79,816
3. अगरिया 67,196
4. माझी 65,027
5. भैना 55,975
6. मझवार 55,320
7. धनवार 50,995
25 हजार से 50 हजार तक
1. खरिया 49,032
2. कमार 26,530

क्र.

जनजाति का नाम

जनसंख्या

10 हजार से 25 हजार तक
1. कोल 20,873
2. मुण्डा 15,095
3. पारधी, शिकारी, बहेलिया 13,476
4. पाव 12,729
5. परधान 11,111
6. कोंध 10,991
7. भुंजिया 10,603
5 हजार से 10 हजार तक
1. गदबा 8,535
2. बियार 5,525
1 हजार से 5 हजार तक
1. सौंता 3,502
2. बिरहोर 3,104
3. परजा 1,212